जब धुनें बदलती हैं और विरासत घायल होती है

हाल ही में एक हरियाणवी गीत के रीमिक्स को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी बहस छिड़ी हुई है। कोई इसे फ्यूज़न कहकर सराह रहा है, कोई इसे आधुनिक प्रयोग बता रहा है, तो कोई इसे संस्कृति के साथ खिलवाड़ मान रहा है। लेकिन मेरे लिए यह विवाद केवल एक गीत या एक प्रस्तुति तक सीमित नहीं है। यह उस बड़े प्रश्न की ओर संकेत करता है, जिसे शायद हमें बहुत पहले पूछ लेना चाहिए था—क्या हम अपनी सांस्कृतिक धरोहर को सचमुच समझते हैं और संभाल पा रहे हैं, या अनजाने में ही उसे धीरे-धीरे विकृत करते जा रहे हैं।

मैं हरियाणा में जन्मी और पली-बढ़ी हूँ। मेरे बचपन की स्मृतियाँ हरियाणवी गीतों और नृत्य से भरी हुई हैं। वे गीत केवल मनोरंजन नहीं थे; वे जीवन के दस्तावेज़ थे। उनमें घर था, आँगन था, रिश्तों की गर्माहट थी, ऋतुओं की खुशबू थी और स्त्री-जीवन की गहरी संवेदनाएँ थीं। गाँवों में, घरों के आँगनों में, तीज-त्योहारों पर, शादी-ब्याह में, या यूँ ही शाम को बैठकी के दौरान जो गीत गूँजते थे, वे हमारे समाज की आत्मा को स्वर देते थे। “पीली पाटी”, “हे माँ मेरी उठ के री”, “मेरा दामन धरा रे सखी आळे में”, “हेरी-हेरी ननद पकड़ जाइये” या “मेरी सास के पाँच पुत्र थे, दो देवर दो जेठ बाई जी” जैसे गीत केवल शब्द नहीं थे, वे उस सामाजिक संसार का सांस्कृतिक मानचित्र थे जिसमें रिश्तों की आत्मीयता, स्त्रियों की साझा दुनिया और जीवन की सरलता एक साथ दिखाई देती थी।

इन गीतों पर जब नृत्य होता था तो उसमें भी एक स्वाभाविक गरिमा दिखाई देती थी। हरियाणवी नृत्य की अपनी शैली होती थी। पैरों की ठोस थाप, हाथों की संतुलित मुद्राएँ, चेहरे की सहज अभिव्यक्ति और शरीर की संयमित गति मिलकर एक ऐसी लय बनाती थीं जिसमें सौंदर्य था, आकर्षण था, पर अश्लीलता नहीं थी। वह नृत्य केवल प्रदर्शन नहीं होता था; वह जीवन की लय का विस्तार होता था।

आज का दृश्य देखकर कई बार मन विचलित हो उठता है। पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल मंचों के विस्तार के साथ हरियाणवी संगीत का एक नया रूप सामने आया है। यूट्यूब और सोशल मीडिया पर प्रतिदिन नए चैनल बन रहे हैं, पुराने लोकगीतों को उठाकर उन्हें रीमिक्स या आधुनिक रूप देने के नाम पर प्रस्तुत किया जा रहा है। कई वीडियो में देखा जा सकता है कि पारंपरिक गीतों के बोल तो वही रहते हैं, लेकिन उनके साथ जो संगीत, दृश्य और नृत्य जोड़े जाते हैं, वे उस गीत की मूल आत्मा से बिल्कुल अलग दिखाई देते हैं। कहीं तेज़ इलेक्ट्रॉनिक बीट्स के बीच लोकधुन दब जाती है, कहीं मंच पर प्रस्तुत नृत्य केवल शरीर को झटकने की क्रिया बनकर रह जाता है। कई वायरल वीडियो में पारंपरिक वेशभूषा का प्रयोग केवल बाहरी आकर्षण के लिए किया जाता है, जबकि नृत्य की शैली और प्रस्तुति उस संस्कृति की मूल गरिमा से बहुत दूर चली जाती है।

इस बदलाव को केवल आधुनिकता कह देना शायद पर्याप्त नहीं है। किसी भी संस्कृति में परिवर्तन स्वाभाविक होता है। संगीत बदलता है, शैलियाँ बदलती हैं और नई पीढ़ियाँ अपने समय की अभिव्यक्ति खोजती हैं। लेकिन परिवर्तन और विकृति के बीच एक सूक्ष्म रेखा होती है। फ्यूज़न का अर्थ यह नहीं होता कि मूल आत्मा ही नष्ट कर दी जाए। जब पुराने गीतों को नए संगीत के साथ प्रस्तुत किया जाता है तो आवश्यक है कि उनकी भावना, शब्दों की गरिमा और सांस्कृतिक संदर्भ सुरक्षित रहें। लेकिन आज कई बार ऐसा लगता है कि पुराने लोकगीतों को इसलिए उठाया जा रहा है ताकि उन्हें वायरल कंटेंट में बदला जा सके और कुछ ही दिनों में लाखों व्यूज़ प्राप्त किए जा सकें। लोकप्रियता की इस दौड़ में गीत का सांस्कृतिक अर्थ पीछे छूट जाता है।

हरियाणवी संस्कृति की चर्चा करते समय एक और परंपरा को याद करना आवश्यक है—रागनी की परंपरा। कभी हरियाणा की चौपालों, मेलों और मंचों पर रागनी केवल एक गायन शैली नहीं थी; वह पूरे समाज की आवाज़ थी। रागनी गाने वाले कलाकार अपने सुरों के माध्यम से इतिहास, लोककथाओं, वीरता, सामाजिक मूल्यों और जीवन की विडंबनाओं को व्यक्त करते थे। उनमें हास्य भी होता था, व्यंग्य भी होता था, और कई बार समाज को आईना दिखाने का साहस भी। किसी गाँव के मेले में या किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम में जब रागनी गूँजती थी तो लोग घंटों तक बैठे सुनते थे, क्योंकि वह केवल गीत नहीं होता था, वह विचार और अनुभव का साझा मंच होता था। आज वही रागनी संस्कृति धीरे-धीरे धुंधली होती दिखाई देती है। नए मंचों पर उसकी जगह अक्सर तेज़ संगीत और तात्कालिक मनोरंजन ने ले ली है। यह केवल शैली का परिवर्तन नहीं है; यह उस परंपरा के कमजोर पड़ने का संकेत भी है जिसने कभी हरियाणा की सांस्कृतिक पहचान को गढ़ा था।

यह समझना आवश्यक है कि लोकगीत और लोकनृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं होते। वे किसी समाज की स्मृति होते हैं। हरियाणवी लोकगीतों में खेतों की मिट्टी है, चौपाल की बातचीत है, विवाह की रस्में हैं, बहनों की छेड़छाड़ है और जीवन की सरलता है। जब इन्हें केवल व्यावसायिक दृष्टि से देखा जाता है तो उनका अर्थ बदल जाता है। कला केवल कंटेंट नहीं होती; वह परंपरा की जिम्मेदारी भी होती है।

आज के युवा कलाकारों के पास तकनीक है, मंच है और दुनिया तक पहुँचने का अवसर है। यह अपने आप में एक बड़ी शक्ति है। लेकिन शक्ति के साथ जिम्मेदारी भी आती है। यदि हम अपनी ही धरोहर को पहचान नहीं पाएँगे तो उसे बचाएँगे कैसे। यदि हमें अपनी संस्कृति को संभालना नहीं आता तो कम से कम हमें उसे विकृत करने का अधिकार भी नहीं होना चाहिए। हरियाणा की संस्कृति में सादगी है, आत्मसम्मान है और एक विशिष्ट सौंदर्य है। इसे केवल सस्ती लोकप्रियता के लिए बदल देना न कला है, न प्रयोग।

मैं यह नहीं कहती कि संगीत बदलना नहीं चाहिए। हर युग अपनी शैली बनाता है और नई पीढ़ी को प्रयोग करने का पूरा अधिकार है। लेकिन प्रयोग का अर्थ यह नहीं कि हम अपनी जड़ों को ही काट दें। यदि हम सचमुच आधुनिक होना चाहते हैं तो हमें अपनी परंपरा को समझना होगा, उसके भीतर की संवेदना को पहचानना होगा और उसे सम्मान देना होगा। तभी नया संगीत भी अर्थपूर्ण बन सकेगा।

वरना आने वाली पीढ़ियाँ शायद यह भी नहीं जान पाएँगी कि हरियाणवी लोकगीतों में कभी कितनी कोमलता, लय और सांस्कृतिक गहराई हुआ करती थी, और तब हमें यह स्वीकार करना पड़ेगा कि हमने अपनी ही धरोहर को बचाने की बजाय उसे मनोरंजन के बाज़ार में खो दिया।

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